Karwa Chauth varat 2022 कब है 13 या 14 को ?

या देवी सर्वभूतेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।
आठों सिद्धियो कि दाता है माँ सिद्धिदात्री :-
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं। माँ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। माँ सिद्धिदात्री अपने साधको को सिद्धियां देती है। देवीपुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से ही इन सिद्धियों को प्राप्त किया था। इनकी अनुकम्पा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। इसी कारण भगवान शिव,पूरे लोक में 'अर्द्धनारीश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुए।।
माँ सिद्धिदात्री का अलौकिक स्वरूप :-
माँ सिद्धिदात्री चार भुजाओं वाली हैं। इनका वाहन सिंह है। ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती हैं। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में कमलपुष्प है। माँ सिद्धिदात्री को देवी सरस्वती का भी स्वरुप माना गया है जो श्वेत वस्त्रालंकार से युक्त महाज्ञान और मधुर स्वर से अपने भक्तों को सम्मोहित करती है ।
नवदुर्गाओं में माँ सिद्धिदात्री अंतिम हैं। अन्य आठ दुर्गाओं की पूजा उपासना शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार करते हुए भक्त दुर्गा पूजा के नौवें दिन इनकी उपासना में प्रवत्त होते हैं। इन सिद्धिदात्री माँ की उपासना पूर्ण कर लेने के बाद भक्तों और साधकों की लौकिक, पारलौकिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। सिद्धिदात्री माँ के कृपापात्र भक्त के भीतर कोई ऐसी कामना शेष बचती ही नहीं है ।
सर्वकामावसायिता, दूर श्रवण, परकामा प्रवेश, वाकसिद्ध, अमरत्व भावना सिद्धि आदि समस्त सिद्धियों नव निधियों की प्राप्ति होती है। ऐसा कहा गया है कि यदि कोई इतना कठिन तप न कर सके तो अपनी शक्तिनुसार जप, तप, पूजा-अर्चना कर माँ की कृपा का पात्र बन सकता ही है। माँ की आराधना के लिए इस श्लोक का प्रयोग होता है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में नवमी के दिन इसका जाप करने का नियम है ।।
माँ सिद्धिदात्री कि पूजा बिधि :-
सर्वप्रथम कलश की पूजा करके व उसमें स्थापित सभी देवी-देवताओ का ध्यान करना चाहिए। रोली,मोली,कुमकुम,पुष्प चुनरी आदि से माँ की भक्ति भाव से पूजा करें। हलुआ,पूरी,खीर,चने,नारियल से माता को भोग लगाएं। इसके पश्चात माता के मंत्रो का जाप करना चाहिए ।।
नवमी के दिन कन्या पूजन का महत्व :-
कन्या पूजन, एक पवित्र अनुष्ठान है, जिसे नवरात्रि पर्व के आठवें और नौवें दिन किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से नौ बाल कन्याओं की पूजा की जाती है, जो देवी दुर्गा ( नवदुर्गा ) के नौ रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। हिंदू दर्शन के अनुसार, इन लड़कियों को सृजन की प्राकृतिक शक्ति की अभिव्यक्ति माना जाता है। मना जाता है कि नवरात्रि के नौवें दिन शक्ति ने देवी दुर्गा का रूप धारण किया था, देवों के अनुरोध पर राक्षस कलसुरा का वध करने के लिए।
यह देवी के सम्मान के रूप में इन नौ बाल कन्याओं के पैरों को धोने की एक प्रथा है और फिर भक्त द्वारा उपहार के रूप में इन्हें नए कपड़े प्रदान किये जाते हैं। देवी पूजा के एक भाग के रूप में कन्या पूजा, कन्याओं में निहित स्त्री शक्ति को पहचानने के लिए किया जाता है ।
माँ सिद्धिदात्री का पूजा मंत्र :-
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि | सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||
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